In the era of epidemic, instead of relief, taxes of 100 crores were collected, many hotels-restaurants closed, many changed their jobs. | महामारी के दौर में राहत की बजाय वसूल लिए 100 करोड़ के टैक्स, कई होटल्स-रेस्टोरेंट बंद, कई ने काम ही बदल लिया


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जोधपुरएक घंटा पहलेलेखक: कमल वैष्णव

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उद्योग का दर्जा लेने के लिए संघर्ष कर रहे इस कारोबारी वर्ग से हो रही है 8 तरह के टैक्स-सेस की वसूली। - Dainik Bhaskar

उद्योग का दर्जा लेने के लिए संघर्ष कर रहे इस कारोबारी वर्ग से हो रही है 8 तरह के टैक्स-सेस की वसूली।

  • अकेले जोधपुर में ही 700 होटल-रेस्टोरेंट्स, कई होटलों के तो पिछले डेढ़ साल से दुबारा ताले ही नहीं खुले

कोरोना महामारी आई तो इसने आम से लेकर खास तक किसी को नहीं बख्शा। व्यक्तिगत रूप से तो इस बीमारी ने सबको प्रभावित किया ही, साथ ही साथ आर्थिक रूप से तो हर किसी को झकझोर दिया। इनमें कुछ ट्रेड ऐसे भी हैं, जिन्हें अन्य के मुकाबले ज्यादा संकट से जूझना पड़ा। ऐसा ही एक वर्ग है हॉस्पिटेलिटी क्षेत्र। देशभर में करीब साढ़े पांच करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले इस ट्रेड को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और तकरीबन 3 करोड़ लोग बेरोजगारी की कगार पर पहुंच गए।

करीब डेढ़ साल से लगातार महामारी के प्रतिकूल प्रभाव से सामना कर रहे इस ट्रेड से जुड़े कई लोग तो होटल या रेस्टोरेंट बंद करके दूसरे काम का रुख भी कर चुके हैं। महामारी के इस दौर में जोधपुर के ही तकरीबन 700 से ज्यादा होटल-रेस्टोरेंट को सरकार ने राहत को अंश मात्र भी नहीं दी, उल्टा इनसे 8 तरह के अलग-अलग कर-सेस के रूप में ही सरकार 100 करोड़ से ज्यादा रुपए भी वसूल चुकी है।

इनमें मुख्य रूप से यूडी टैक्स, फायर सेस, सालाना सेफ्टी के नाम पर फायर शुल्क, ट्रेड लाइसेंस, मैरिज गार्डन टैक्स, सफाई शुल्क, इलेक्ट्रिसिटी पर स्थाई शुल्क और बार लाइसेंस इत्यादि के जरिए वसूली लगातार की जा रही है। जबकि इस महामारी के दौर में तकरीबन सभी होटल-रेस्टोंरट तो बंद ही रहे, लेकिन इनमें से किसी भी तरह के टैक्स या अन्य से राहत नहीं मिली है।

उद्योग का दर्जा तक नहीं दे रही सरकार

जोधाणा होटल्स एंड रेस्टोरेंट सोसायटी के अध्यक्ष जेएम बूब के अनुसार जोधपुर में 300 होटल, 100 गेस्ट हाउस और लगभग 350 रेस्टोरेंट्स हैं। इसी तरह देशभर के होटल्स की जीडीपी में करीब 10 प्रतिशत योगदान होता है। इसके बावजूद सरकार होटल्स-रेस्टोरेंट को उद्योग का दर्जा नहीं दे रही है। राजस्थान में इसके लिए लगातार मांग भी उठाई जा रही है। उद्योग का दर्जा मिलने से इस ट्रेड को आंशिक राहत तो मिल ही सकती है। कोरोना महामारी के चलते अधिकांश बड़ी होटल्स में तो मजबूरी में 50 प्रतिशत से ज्यादा स्टाफ में कटौती करनी पड़ी।

इतना ही नहीं, होटल्स-रेस्टोरेंट्स के साथ कैटरिंग, टूरिस्ट गाइड, इवेंट मैनेजमेंट, वैटर्स, हाउस कीपिंग, स्वीपर्स, मैनेजर, फ्रंट ऑफिस स्टाफ, किचन स्टाफ, शेफ इत्यादि की संख्या जोड़ें तो अकेले जोधपुर में ही इनकी संख्या लाखों तक पहुंचती है, जो होटल इंडस्ट्री के बंद होने से आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे हैं। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 30 प्रतिशत रेस्टोरेंट व बार कोरोना महामारी में लॉकडाउन के चलते पूरी तरह बंद हो चुके हैं।

स्कीम 2014 से, टैक्स सब्सिडी का फायदा अब तक नहीं

होटल इंडस्ट्री को राजस्थान इन्वेस्टमेंट प्रमोशन स्कीम-2014 के तहत स्टेट टैक्स में 50 प्रतिशत की छूट देने की घोषणा की गई थी। इसके तहत होटल्स से वसूली जाने वाली टैक्स राशि में सब्सिडी दिए जाने का प्रावधान किया गया था, लेकिन घोषणा से लेकर अब तक के 7 साल से अब तक कई होटल्स को सब्सिडी नहीं दी गई है।

बंद रहे या चालू, खर्चें ऐसे जो लगातार चुकाने की मजबूरी

बूब के अनुसार होटल इंडस्ट्री में कई खर्चे ऐसे हैं, जो होटल बंद रहे या चालू, करने ही पड़ते हैं। इन खर्चों में एक बड़ा हिस्सा स्टाफ की सैलेरी के रूप में होता ही है। एक अनुमान के मुताबिक हर महीने 5 स्टार होटल में लगभग 200 स्टाफ पर 50 लाख रुपए, 4 स्टार होटल्स में 100 के स्टाफ पर 35 लाख, 3 स्टार होटल में 70 के स्टाफ पर करीब 15-20 लाख रुपए और बजट होटल्स में औसतन 20 जनों के स्टाफ पर 2 से 5 लाख रुपए तक का खर्च सिर्फ सैलेरी पर ही होता है।

इनके अलावा बिजली का उपयोग नहीं भी होने पर स्थाई शुल्क व मिनिमम चार्ज, होटल-रेस्टोरेंट के निर्मित एरिया और खाली पड़ी जगह का भी अलग-अलग दर से यूडी टैक्स, फायर सेस, ट्रेड लाइसेंस, इलेक्ट्रिसिटी फीक्स्ड चार्जेज और बार लाइसेंस फीस के खर्चे बिना संचालन के भी चुकाने पड़ते हैं। कोरोनाकाल में टूरिज्म व अन्य गतिविधियां प्रभावित होने से न्यू हाईकोर्ट के सामने स्थित मैरिएट होटल भी बंद हो गई।

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