Hariyali Teej 2021: Banke Bihari seated in a gold-silver carousel in Mathura | 1 लाख तोला चांदी और 2 हजार तोला सोने से बने हिंडोले में विराजमान हुए ठाकुर जी, 1947 में आजादी के दिन से है इस हिंडोले का खास कनेक्शन


मथुरा5 घंटे पहले

पूरा ब्रज हरियाली तीज पर आज उल्लास में डूबा है। मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी से पहले हरियाली तीज धूमधाम से मनाया जा रहा है। भगवान बांके बिहारी सोने-चांदी के हिंडोले (झूले) में विराजमान हो चुके हैं। साल में सिर्फ एक दिन हरियाली तीज पर बांके बिहारी सोने और चांदी के हिंडोले में विराजमान होते हैं। फोटो खींचने पर बैन होने के बावजूद हिंडोले पर विराजमान बांके बिहारी की मनोहारी फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

बांके बिहारी के दर्शन के लिए दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड समेत कई प्रदेशों से श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। पूरा मंदिर परिसर राधे-राधे और ठाकुरजी के जयकारों से गूंज रहा है। आम दिनों से आज ठाकुरजी तीन घंटे अधिक भक्तों को दर्शन देंगे। मान्यता है कि ठाकुरजी को थकान आ जाती है। इसलिए रात में उनके लिए फूलों की सेज सजेगी।

बांके बिहारी झूले पर विराजमान। आज महिलाएं गोपियों के रूप में अपना सोलह श्रृंगार करती हैं और घेवर फेनी का कान्हा को भोग लगाती हैं।

बांके बिहारी झूले पर विराजमान। आज महिलाएं गोपियों के रूप में अपना सोलह श्रृंगार करती हैं और घेवर फेनी का कान्हा को भोग लगाती हैं।

सुबह 7:45 बजे मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। दोपहर दो बजे तक दरबार खुला रहेगा। शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक फिर बांके बिहारी दर्शन देंगे। मंदिर में प्रवेश सिर्फ एक मार्ग से कराया जा रहा है। गेट नंबर तीन से श्रद्धालुओं के प्रवेश और चार नंबर गेट से निकासी की व्यवस्था की गई है।

बांके बिहारी के झूले के अगल-बगल गोपियों की मूर्ति को लगाया गया।

बांके बिहारी के झूले के अगल-बगल गोपियों की मूर्ति को लगाया गया।

द्वापर युग से शुरू हुई थी झूलन उत्सव की परंपरा
द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने राधा रानी को झूला झुलाया। तभी से मथुरा में बृज में झूलन उत्सव की यह परम्परा चली आ रही है। मथुरा के कुछ मंदिरों में हरियाली तीज से लेकर रक्षाबंधन तक 13 दिन तक भगवान को झूले में विराजमान किया जाता है।

जबकि, बांके बिहारी मंदिर में साल में एक बार केवल हरियाली तीज झूला दर्शन होते हैं। इस दिन महिलाएं गोपियों के रूप में अपना सोलह श्रृंगार करती हैं और घेवर फेनी का कान्हा को भोग लगाती हैं। मल्हार गाकर राधा-कृष्ण की झूलन लीला को जीवंत करती हैं।

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़।

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़।

झूले को लगाने में कारीगरों को लगता है 8 घंटे का समय
बांके बिहारी मंदिर में हरियाली तीज पर पड़ने वाला झूला कहीं और देखने को नहीं मिलता है। इस झूले की खास बात ये यह है कि यह 30 फीट ऊंचा और करीब 40 फीट चौड़ा है। इस झूले में 1 लाख तोला चांदी और 2 हजार तोला सोना लगा है। 120 भागों में बंटे इस झूले को लगाने के लिए कारीगरों को करीब 8 घंटे का समय लगता है।

बांके बिहारी दरबार में हरी साड़ियों में पूरे श्रृंगार में सजीं गोपियां।

बांके बिहारी दरबार में हरी साड़ियों में पूरे श्रृंगार में सजीं गोपियां।

बांके बिहारी के लिए झूला लगाने का काम एक दिन पहले शुरू कर दिया गया था

बांके बिहारी के लिए झूला लगाने का काम एक दिन पहले शुरू कर दिया गया था

रस्सी के सहारे कारीगरों ने इसे लगाया।

रस्सी के सहारे कारीगरों ने इसे लगाया।

झूले में सोने-चांदी लगी हुई है।

झूले में सोने-चांदी लगी हुई है।

झूला काफी प्राचीन है। जिस दिन देश आजाद हुआ, उस दिन भी हरियाली तीज थी।

झूला काफी प्राचीन है। जिस दिन देश आजाद हुआ, उस दिन भी हरियाली तीज थी।

आजादी से भी जुड़ा हुआ है झूले का इतिहास ​​​​​​
इस झूले का निर्माण कराने वाले सेठ हरगुलाल के पौत्र विनीत वेरिवाल बताते हैं कि उनके दादा ने इस झूले का निर्माण कराने के लिए बनारस के कारीगर को ठेका दिया था। 1942 में झूले को तैयार करने के लिए लकड़ी करनपुर के जंगल से लाई गई थी। शीशम की लकड़ी को दो साल तक सुखाया गया था। इसके बाद झूले को बनाने का काम शुरू किया गया था। यह झूला 15 अगस्त 1947 को बनकर तैयार हुआ था। उसी दिन देश आजाद हुआ था। संयोग से उसी दिन हरियाली तीज का पर्व भी था। पहली बार भगवान इस दिव्य झूले में 15 अगस्त को ही विराजमान हुए थे।

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